“अब आ जाओ कृष्ण-कन्हैया” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
धूल भरी क्यों आज गगन में? क्यों है अँधियारा उपवन में? सूरज क्यों दिन में शर्माया? भरी दुपहरी में क्यों छाया? चन्दा गुम क्यों बिना अमावस? नजर नही आती क्यों पावस? क्यों है धरती रूखी-रूखी? क्यों है खेती सूखी-सूखी? छागल क्यों हो गई विदेशी? पागल क्यों...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
कविता
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[03 Jun 2010 07:11 AM]



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