संवेदनाएँ छलती हैं
संवेदनाएँ चलती हैंऊँचा हो जाता है जबक़द सर सेसंवेदनाएँ छलती हैं ।मुश्किल हैमन चलता हैपकड़ के मुट्ठी में रखनाखलता है ।मन के पानी परबनती बिगड़ती तस्वीरेंबहुत बोलती हैं ;मौका लगते हीबाँध के सारे द्वार खोलती हैं ।कोई ऐसी दिशा देकि न रोये नादाँखुद को छल के हीन...
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शारदा अरोरा
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[03 Jun 2010 03:23 AM]



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