अरे, उन क्लब वालों की ज़िंदगी मे भूलने को इतना गम ही कहाँ है...
एक पुरानी रचना थोड़े संपादन के साथ फिर से पेश कर रहा हूँ शायद आप सभी को पसंद आये....थके हुए बल्ब की मद्धम रोशनी मे...किसी के लिए चमक का एहसास हूँ...देसी शराब की एक देसी दुकान मे...कोने मे पड़ा स्टील का गिलास हूँ...जाने रोज़ कौन कौन चले आते हैं...फिर...
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दिलीप
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[03 Jun 2010 03:30 AM]



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