''धूप से रूठी चाँदनी'' वास्तव में नैसर्गिक भाषा में नैसर्गिक चिंतन का उद्गार है - डॉ. आज़म (पुस्तक समीक्षा ''धूप से रूठी चाँदनी'' - डॉ. सुधा ओम
मेरा मानना है कि कविताओं की पुस्तकें तीन तरह के घर की तरह होती हैं, एक जिनमें प्रवेश द्वार होता है जो निष्कासन द्वार भी सबित हो जाता है, अर्थात जाइए इधर उधर देखिए वहीं खडे ख़ड़े, फिर निकल आइए । दूसरी तरह की पुस्तक में प्रवेश ...
[पूरी पोस्ट]
पंकज सुबीर
14
4
0
4
4
[03 Jun 2010 02:58 AM]



Shuffle








