अटल बिहारी वाजपेयी : कवि की उलझन

स्वार्थ राह कौन सी जाऊँ मैं? चौराहे पर लुटता चीर चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ? सपना जन्मा और मर गया मधु ऋतु में ही बाग झर गया तिनके टूटे हुये बटोरुं या नवसृष्टि सजाऊँ मैं? राह कौन सी जाऊँ मैं? दो दिन मिले उधार में घाटों के व्यापार में कौड़ी कौड़ी का... [पूरी पोस्ट]
writer स्वार्थ

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[02 Jun 2010 23:34 PM]

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