बिछे हुए हैं चौंसठ खाने

गीत कलश होठों पर आने से पहले शब्द हुआ करते संपादित अब उन पर प्रतिबन्ध नये कुछ बंधी अपेक्षा लगी लगानेचुन रख लिए उम्र की बगिया में से एक एक कर कर कर अनुभव के सांचों में ढल कर जितने फूल मिले क्यारी में गुच्छे बना शब्द में ढाले और उन्हें सरगम में बांधाकिन्तु रहे वे... [पूरी पोस्ट]
writer राकेश खंडेलवाल
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[02 Jun 2010 22:01 PM]

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