"ख़ुदा लिखदूं तुम्हें" "समुंदर बूक सूं पील्यूं"
आज, बस इतना ही कि दिल का पैग़ाम दिल तक पहुंचे…दिल की … दिल से … दिल कहे……दिल समझे … दिल ही सुने……ताकि दिलों को सुकून-ओ-राहत मिले… पेश-ए-ख़िदमत है दो ग़ज़लें एक हिंदुस्तानी में , एक राजस्थानी में ख़ुदा लिखदूं तुम्हेंकहां लिखदूं , यहां लिखदूं , जहां कहदो...
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Rajendra Swarnkar
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[02 Jun 2010 21:18 PM]



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