कोई बचा लो मुझको मर रहा हूँ मैं
दीपक 'मशाल' जी के सुझाव पर अपनी इस रचना में कुछ पंक्तियाँ और जोड़ कर प्रस्तुत कर रहा हूँ.....
कोई बचा लो मुझकोमर रहा हूँ मैंएक बार में मरता तो अलग बात थी किस्तों में मर रहा हूँ मैं,
पहले ज़मीर मराफिर इंसानियतअब तिल तिल कर मर रही है मेरी...
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nilesh mathur
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[02 Jun 2010 13:29 PM]



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