संजय व्यास की कविता - तीसरी किस्त
फ्रेम एक भरी पूरी उम्र लेकरदुनिया से विदा हुई दादी के बारे मेंसोचता है उसका पोताबड़े से फ्रेम में उसके चित्र को देखता।विस्तार में फ्रेम को घेरे उसका चेहराबेशुमार झुर्रियां लिएजिनमे तह करके रखा है उसने अपना समय।समय जो साक्षी रहा हैकई चीज़ों के अन्तिम बार...
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शिरीष कुमार मौर्य
युवा कविता
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[02 Jun 2010 12:07 PM]



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