फैज़ अहमद फैज़ की एक नज़्म
जन्मशताब्दी है इस साल फैज़ कीहम देखेंगे लाजिम है कि हम भी देखेंगेवो दिन कि जिसका वादा हैजो लौह-ए-अजल में लिखा हैजब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरांरुई की तरह उड़ जाएँगेदम महकूमों के पाँव तलेजब धरती धड़ धड़ धड़केगीऔर अहल-ए-हिकम के सर ऊपरजब बिजली कड़ कड़...
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अशोक कुमार पाण्डेय
नज़्म
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[02 Jun 2010 11:01 AM]



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