हवा तो हवा है

उधेड़-बुन हर जगह वो चलती हैवो हमारी-तुम्हारी सांस नहींजो सरहदों में सिसकती हैईश्वर की दृष्टिहै समान सब परजंगल और शहर में वोभेद नहीं करती हैयूँ निकालो तेलतो तेल निकलता नहीं हैऔर अब निकली है धारतो रोके न रूकती हैमरने को तो मरते हैंहज़ारों लोग रोज़लेकिन उड़नेवालों के... [पूरी पोस्ट]
writer Rahul Upadhyaya

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[02 Jun 2010 10:53 AM]

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