जिकर करण के लायक नहीं और चुप रहया ना जावै, {हरयाणवी रागणी},
ये मन भी...बस कुछ भी कहीं भी महसूस करने लग जाता है,नहीं सोचता चलो घर की ही तो बात है,पर नहीं...इन शब्दों के आगे भला हमारी क्या बिसात है...?घर की हो या बहार वालो की अब घात तो घात है....आज कुछ आपबीती जो जैसे अनुभव की थी ज्यों की त्यों प्रस्तुत...
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kunwarji's
haryaanvi raagni
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[02 Jun 2010 09:49 AM]



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