सुनील कुमार की एक और कविता
कविता रेलगाड़ी हम सब मुसफ़िर है उस रेल गाड़ी के, जिसको भ्रष्टाचार का इंजन, बेईमानी के कोयले से खींच रहा है |रास्ते में पड़ने वाले स्टेशनजैसे ईमानदारी ,सदाचार और त्याग हमें ...
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Sunil Kumar
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[02 Jun 2010 09:27 AM]



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