“धैर्य और बुद्धि से काम लेना चाहिए” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
विभुक्षिता किं न करोति पापम्,क्षीणाः जनाः निष्करुणा भवन्ति।त्वं गच्छ भद्रे प्रियदर्शनाय,न गंगदत्तः पुनरेति कूपम्।।उपरोक्त श्लोक का अर्थ लिखने से पूर्व एक छोटी सी कथा के माध्यम से ही इसे समझाने का प्रयत्न करता हूँ।एक कुएँ में प्रियदर्शन नाम का साँप, भद्रा...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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[02 Jun 2010 09:39 AM]



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