ये कैसा प्रेम का पंछी है....................
वो रोज मुझे ये कहता है प्रेम वो मुझसेकरता हैमैं रोज उसेये कहती हूँ प्रेम तो बस इक धोखा हैवो रोज मुझेसमझाता हैप्रेम के पाठ पढ़ाता हैमैं रोज उसेबतलाती हूँये प्रेम हवा काझोंका हैजो आकर गुजर जाता हैकभी ठहर कहीं नहीं पाता...
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वन्दना
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[02 Jun 2010 08:30 AM]



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