“बेमौसम वीरान हो गये!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

uchcharan गुमनामों की इस बस्ती में, नेकनाम बदनाम हो गये! जो मक्कारी में अव्वल थे, वो अव्वल सरनाम हो गये! जो करते हैं दगा-फरेबी, वो पाते हैं दूध-जलेबी, सच्चाई के सारे जेवर, महफिल में नीलाम हो गये! न्यायालय में न्याय बिक रहा, सरे-आम अन्याय टिक रहा, पंच और सरपंच... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

गीत

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[02 Jun 2010 08:25 AM]

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