उस्ताद शायर पुरुषोत्तम "यकीन" की शायरी
आग है हर सू आग हवामत गा दीपक राग हवामैं मिरदंग बजाता हूंतू गा कोई फ़ाग हवाबन्द है इस बोतल में ज़िनखोल न इस का काग हवाअब कुछ ऎसा शोर मचादुनिया जाए जाग हवातेरी अपनी ढपली हैतेरा अपना राग हवादेखें किसकी आए खबरउड तो गया है काग हवाकैसी "यकीन" हवा ये चलीहो गए...
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पुरु मालव
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[02 Jun 2010 07:23 AM]



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