दिल्ली में [गज़ल] - दीपक 'बेदिल'
तुम भी परेशां हम भी परेशान दिल्ली में हम दो ही तो दुखी हैं इन्सान दिल्ली में किसी भूखे को यहाँ कोई रोटी नहीं देता दिल छोटे और बड़े हैं मकान दिल्ली में रिश्ता बनता नहीं कि टूट जाता है पहले इश्क हो या दोस्ती कुछ नहीं आसान दिल्ली में अतिरिक्त......
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[02 Jun 2010 03:30 AM]



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