जब प्यार का सावन
जब प्यार का सावन, तेरी लाती हैं चिट्ठियाँ छूते ही नज़रों के बरस जाती हैं चिट्ठियाँ हर शब्द में मुस्कान है, कागज़ है नम मगर रोते हुए हँसती हो, बतलाती हैं चिट्ठियाँ कोई पता ना नाम है जिनके नसीब में कोरे लिफाफे की वे तड़पाती हैं चिट्ठियाँ पहचान लेतीं छू के...
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प्रताप नारायण सिंह
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[02 Jun 2010 00:20 AM]



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