उसके बगैर कितने ज़माने गुज़र गए...
कुछ ख़्वाब इस तरह से जहां में बिखर गएअहसास जिस क़द्र थे वो सारे ही मर गएजीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभीउसके बगैर कितने ज़माने गुज़र गएमाज़ी किताब है या अरस्तु का फ़लसफ़ाऔराक़ जो पलटे तो कई पल ठहर गएकब उम्र ने बिखेरी है राहों में कहकशांरातें मिली स्याह,...
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फ़िरदौस ख़ान
ग़ज़ल
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[01 Jun 2010 23:45 PM]



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