कोई बचा लो मुझको मर रहा हूँ मैं
कोई बचा लो मुझको
मर रहा हूँ मैं
एक बार में मरता तो अलग बात थी
किस्तों में मर रहा हूँ मैं, पहले ज़मीर मरा
फिर इंसानियत
अब तिल तिल कर
मर रही है मेरी संवेदनाएं, कोई दे दे मुझको दवा
या दारु ही सही
नशे में ही जान निकले
तो अच्छा,...
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nilesh mathur
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[01 Jun 2010 15:32 PM]



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