उसका आया है ख़त कि भूल जाऊं उसे
आया है ख़त उसका कि अब भूल जाऊं उसे ग़ज़ल न रही वो मेरी, अब न गुनगुनाऊ उसे रहा यतीम ख्याल सुनहरा तेरे मेरे रिश्ते काजब न कोई निस्बत तुझसे तो क्या अपनाऊँ उसे उफ़क तक भी न पहुंचा अहसास अक़ीदत का खौफज़दा सजदों का सच, मैं क्या बतलाऊँ उसे बढ़ गया...
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Sudhir (सुधीर)
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[01 Jun 2010 14:00 PM]



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