सब एकाकी
इस संसृति में सब एकाकी ! चमक रहा ऊषा के आँचल में नभ का तारा एकाकी ! इस संसृति में सब एकाकी ! ज्वार उठा सागर के उर में लहरें तट पर आ टकराईं,निर्मम तट पर आकर उसने निज जीवन की निधि बिखराई,सागर में अब भी हलचल है तट पर लहर मिटी एकाकी ! इस संसृति में सब एकाकी...
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Sadhana Vaid
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[01 Jun 2010 10:40 AM]



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