'कारवाँ
पुनः सम्पादित एवं प्रकाशित ------------------------------मैं चला तो था सफ़र में, कारवां के साथ साथ,थे कहीं कन्धों पे बाहें, और कहीं हाथों में हाथ,रास्ते में जाने कैसे, साथ हर छुटता गया,वक्त गुज़रता गया, काफिला घटता गया, कुछ मेरी तेज़ी से न चल...
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योगेश शर्मा
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[01 Jun 2010 10:42 AM]



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