ये ख्याल कब तक

Ajnabi इस सफर से,मेरी मर्जी ना पूछ।हवाओं से मजबूर तिनकों की,क्या कोई मर्जी होती है?जो भी अपना है,बस उतना ही अपना है,जितनी की मेरी गलतफहमी।पता नहीं वक्त क्या होता है,मंजिल क्या होती है।ये ख्याल कब तक पलता है,ये जिस्म कहां ढलता है।राजेशा का ब्लॉग - अजनबी... [पूरी पोस्ट]
writer Rajey Sha

नज्‍़म nazm

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[01 Jun 2010 09:28 AM]

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