जो बिना खर्चे बिना असले के जीत की गारंटी दिलाती है ......

काव्य मंजूषा  कहीं मंदिर में घंटी बाजेकहीं अजान सुनाती हैपाँच बजे पौ फटते ही वो पाने भरने जाती हैचारों चौहद्दी नलका के मजमा बड़ा लगाती हैबाल्टी और देगची की कतार बढ़ती ही जाती है मेरी बारी पहले आये हर रण-नीति अपनाती है ऐसी पोलिटिक्स चलती है कि पोलिटिक्स ख़ुद... [पूरी पोस्ट]
writer 'अदा'
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[01 Jun 2010 08:47 AM]

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