फूल बन कर जो चुभते रहे ऐसे काँटों को क्या नाम दें ग़ैर होते तो हम सोचते कैसे अपने को इल्ज़ाम दें
बाद मुद्दत के हम\-तुम मिले मुड़ के देखा तो हैं फ़ासले चलते\-चलते ठोकर लगी यादें वादे आवाज़ देते न काश \-२ कि: बाद मुद्दत के हम\-तुम मिले मुड़ के देखा तो हैं फ़ासले चलते\-चलते ठोकर लगी यादें वादे आवाज़ देते न काश फूल बन कर जो चुभते रहे ऐसे काँटों को क्या...
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[01 Jun 2010 07:51 AM]



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