वह सुनयना थी ...............
वह सुनयना थीकभी चोरी-चोरी मेरे कमरे मे आतीनटखट बदमाशमेरी पेन्सिले़ उठा ले जातीऔर दीवाल के पास बैठकरअपनी नन्ही उगलियों से, भीती में चित्र बनातीअनगिनत-अनसमझ, कभी रोती कभी गातीवह फिर आयी थी मेरे कमरे मेंमुझे देख सकुचाई थीनव-पल्लव सी अपार शोभा लिए,पलक संपुटो...
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vikram7
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[01 Jun 2010 07:20 AM]



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