दिल की कलम से
दोहेंदुःख अपना किस से कहें,सभी यहाँ मशगूल। हमने भी रोते हुए, कर ली हँसी कबूल । कोलाहल में दिन गया, अवसादों में रैन । जीवन की घुड़ दोड़ में, मिला कही न चैन। विलासिता के चीर से, सज- धज गया शरीर ।तन के उजले हो गए,मन के रहे फकीर । कलयुग के इस दौर की, क्या...
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पुरु मालव
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[19 Jan 2009 04:34 AM]



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