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दिल की कलम से उनसे यों जुदा होकर फिर क़रीब आने मेंदेर लगती हैं आखिर फ़ासले मिटाने मेंकितनी देर लगती है आसमाँ झुकाने मेंलोग-बाग माहिर है उँगलियाँ उठाने मेंकिस तरह भला उसने ये जहाँ बना डालादम निकल गया मेरा अपना घर बनाने मेंआजमाके तो देखूँ एक बार उसको भीजो य़कीन रखता हो... [पूरी पोस्ट]
writer पुरु मालव
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[25 Mar 2010 04:51 AM]

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