नज़र साहब और उनकी शायरी को सलाम
तुम तो ठहरे ही रहे झील के पानी की तरहदरिया बनते तो बहुत दूर निकल सकते थे
जी नहीं। यह कलाम मेरा नहीं है। पर फिर न जाने क्यों मुझे लगता है जैसे शायर ने मुझ पर लिखा है। मैं 27 साल तक बस एक ही जगह बैठा रहा, यानी काम यानी नौकरी करता रहा। आज जब वहां से...
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राजेश उत्साही
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[01 Jun 2010 01:10 AM]



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