मन प्याली, मदिरा थी प्रीत ..! ह्रदय की सुराही तौ पर न रीती
[साभार: श्री विजय अग्रवाल ] मन प्याली, मदिरा थी प्रीती ..!ह्रदय की सुराही तौ पर न रीती *****************लोग कहें बावली, इत उत मद छलकायेबोलूं तो लोग कहें- काहे तू इतराये ?सीमा जो लांघी तो सोच लै परणीति !!******************न तू सुहागन...
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गिरीश बिल्लोरे
सूफ़ी
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[31 May 2010 15:46 PM]



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