आदमीयत से भरी सोच
सबकुछ उल्टा-पुल्टा है। लिखना या पढना कठिन हो चला है। अब यह देखने वाली बात है कि इमानदारी और मेहनत से भरा प्रतिभायुक्त पिचका पेट आखिर कितनी और पराजय पचा सकता है? कब तक बडे पेट वालों की डकार अपने नथूनों में भरकर चाटुकार अपनी चमक बिखेरते रहेंगे? कोई एक तो...
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अमिताभ श्रीवास्तव
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[31 May 2010 15:23 PM]



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