जाते जाते,,, तेरे नाम मां...
वो दानिश्तां छोड़कर दामन मेराशहर की गलियों में खो गया आखिर हमने बारहा रोका था कहके रस्ता तेराअपनी मिट्टी से बिछडकर न बच पाएगा यहां की माटी तेरे पुरखों की अमानत है ये बाग़, ये गुलशन, ये खंडहर सबएक उम्र बचा रखते हैं अपने पहलू में टूटती शाख कोई हिसाब है...
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Sonalika
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[31 May 2010 12:16 PM]



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