पर अफ़सोस! तुम नही आयीं...

राष्ट्र सर्वोपरि शायद मेरे सुनने मे ही कमी होगी,या ये शाम बिन कहे ही ढल गयी होगी, तुम आ जाते तो ज़रूर कह ही देता,शायद कुछ देर दर्द सह ही लेता!तुमने ताज़ा किए जो जख्म सवेरे मे,शाम मरहम लगाने तो आ जाती,दर्द मे मेरे कुछ कमी आती,याद बरबस पुरानी आ जाती!पर अफ़सोस! तुम नही... [पूरी पोस्ट]
writer sanu shukla
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[31 May 2010 12:55 PM]

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