देर हो जाने की नियति या दुख!

जनपद आज फिर अशोक वाजपेयी की ही कविता। साल 1994 की। देर हो जाने की नियति या देर हो जाने के दुख के साथ। पढ़नेवाले को संजीदा कर देती है यह कविता।० देर हो जाएगी/अशोक वाजपेयी ०  देर हो जाएगी-बंद हो जाएगी समय से कुछ मिनिट पहले हीउम्मीद की खिड़कीयह कहकर कि गाड़ी... [पूरी पोस्ट]
writer अरविन्द चतुर्वेद
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[31 May 2010 12:22 PM]

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