ये कैसा इन्क़लाब
है इन्क़लाब , ग़र लहू बहाने का ही नाम,तो इन्क़लाब और अभी आयेगा, ज़रा ठहरो तो,खाद बारूद की है,बोई हैं बंदूकें जहाँ,खेत, लाशें ही उगाएगा, ज़रा ठहरो तो,नफरत के शोलों को हवा देने वालों ,घर तुम्हारा भी जल जायेगा, ज़रा ठहरो तो,इंसान की नस्ल को बेहतर करते...
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योगेश शर्मा
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[31 May 2010 11:32 AM]



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