फलक
न जाने कब ये शाम का गोला ढल जाए. और एक स्याह रात की चादर सिल जाए.करोड़ों जगमगाते टुकड़े पैबंद हों उस पर, स्याह शामियाने पे नक्काशी खिल जाए.तू रोज़ देखता है टक-टकी लगाए मुझे.बढाऊँ हाथ जो ऊपर, तू छिटक जाए मुझे किसी रोज़ पैबंद हो जाऊं शामियाने पर,ए खुदा तू...
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●๋• नीर ஐ
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[31 May 2010 11:02 AM]



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