“चाँद पर चांदनी नहीं होती” पर समीक्षा - वीनस केशरी

आते हुए लोग कुछ किताबें होती हैं जिन्हें एक प्याली गर्म चाय की तरह पीया जाता है, देर करने पर चाय ठंढी हो जाती है, लुत्फ़ खत्म |वहीं कुछ किताबें कच्चे आम और पुदीने की चटनी की तरह होती हैं, थोड़ा थोड़ा खाते रहिये और आपका रोम रोम चटपटा हो जाए | “चाँद पर चांदनी नहीं... [पूरी पोस्ट]
writer वीनस केशरी
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[31 May 2010 10:01 AM]

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