आँख के सामने क्यूँ अन्धेरा है

कुछ ईधर की, कुछ उधर की क्यों जम्हाई आ रही है बेतरहइस तरह से आँख क्यों है झप रहीदेख लो चहुँ ओर क्या है हो रहाबात सुन लो, आँख खोलो तो सही..........सच की समझ तुम जो नहीं रखतेतो क्यों न रूचें तुम्हें घुनी बातेंसच को सच कहें कैसेजब सुनी हैं बनी चुनी बातें.......आँख खोलिए तनिक जतन... [पूरी पोस्ट]
writer पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
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[31 May 2010 08:28 AM]

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