मंगलौर के दर्द के बीच

मीडिया स्कूल हादसे एक ही बात कहते हैं मंगलौर में हो या मुंबई में इंसान के रचे हों या कुदरत से भुगते कि सांसों का कोई भरोसा नहीं सबसे अनजानी, अपरिचित सांसें ही हैं कभी भी, कहीं भी फिसल सकती हैं अनुलोम-विलोम के बीच जब रोकती हूं सांसों को कुछ पलों के लिए अंदर ही तो लगता... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ वर्तिका नन्दा
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[31 May 2010 06:10 AM]

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