हमरी अटरिया पे आओ संवरिया
कभी कभी कुछ गीत कितनी पुरानी यादों को छेड़ देते हैं. उस रात जब उमा (अचानक, जिसकी मैं अपेक्षा भी नहीं कर रहा था) ने यह गीत सुनाया तो हमें पटना के वे दिन याद आ गए, जब प्रभात खबर के दफ्तर के सामने अजय जी (जो तब प्रभात खबर के संपादक हुआ करते थे) के साथ...
[पूरी पोस्ट]
Reyaz-ul-haque
जनता के गीत
11
0
0
0
1
[31 May 2010 04:11 AM]



Shuffle








