क्या हमारा अपना इतना सामर्थ्य है की हम परमात्मा की दी हुई प्रेरणा को अस्वीकृत कर दे,उसे औचित्यहीन घोषित कर दे,बिना उसकी सहमती या आज्ञा के.....?-(एक
आज बस एक प्रशन जिससे मै अकेला जूझता रहता हूँ!"क्या हमारा अपना इतना सामर्थ्य है कि हम परमात्मा की दी हुई प्रेरणा को अस्वीकृत कर दे,उसे औचित्यहीन घोषित कर दे,बिना उसकी सहमती या आज्ञा के.....?"मै मानता हूँ कि 'शब्द' 'विचार' को अक्षरशः...
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kunwarji's
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[31 May 2010 03:04 AM]



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