ग्रीष्म ऋतू की त्रिपदी - डॉ. वेद व्यथित

साहित्यशिल्पी.इन क्यों इतना जलाते हो थोडा तो जरा ठहरो क्यों राख बनाते हो ये आग ही तो मैं हूँ यदि आग नही होगी तो राख ही तो मैं हूँ अपनों ने ही सुलगाया क्या खूब तमाशा है नजदीक में जो आया अतिरिक्त...... [पूरी पोस्ट]
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[30 May 2010 20:30 PM]

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