तूलिका पी गई रंग खुद ही सभी
सूख निर्झर गये भावना के सभी, भाव उमड़े नहीं छंद में जो ढलेंकल्पना की डगर के पथिक थक गये, पांव बोझिल हुए ये न संभव चलबांध कर थे कतारें खड़े अक्षरों का नहीं थाम पाई कलम हाथ भीछन्द के पास भी शेष कुछ न रहा, सिर्फ़ यह हाथ अपने निरतर मलेंचाह तो थी कलम की उकेरे...
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राकेश खंडेलवाल
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[30 May 2010 21:54 PM]



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