मन का इकतारा अब केवल

गीतकार की कलम पता नहीं किसका प्रभाव लज्जा के बन्धन खोले हैमन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है ओढ़ी हुई एक कमली की छायायें हो गईं तिरोहितनातों की डोरी के सारे अवगुंठन खुल कर छितरायेबांधे अपने साथ सांस को द्रुत गति चले समय के पहिये उगी भोर के साथ साथ ही संध्या के... [पूरी पोस्ट]
writer Geetkaar
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[30 May 2010 21:45 PM]

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