रस्मे - उल्फ़त को निभाएं तो निभाएं कैसे
रस्मे - उल्फ़त को निभाएं तो निभाएं कैसेगम के इस बाग में हम फूल खिलाएं कैसे |फेर ली नज़रें उसने इतनी नफ़रत सेप्यार से उसको बुलाएं तो बुलाएं कैसे |हर कदम उसकी आहटे सुनतामुड़ के जब देखता वह नहीं होताअब तो खामोश हो गए हैं सभी कोई जो उसको सुनाये तो सुनाएं कैसे...
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aarya
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[30 May 2010 12:55 PM]



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