तुम ज़रा मुन्डेरो पे चढ़ना, देखो कुछ बादल आए हैं....
सरपत की सींकों के झुरमुट , मेड़ों पे तन कर झूम रहे...तोते भी हो उन्मुक्त आज, घर के पिंजरों मे घूम रहे...दिनकर जी अपने रथ को ले, जा दूर कहीं पर दुबके हैं...चुपचाप पपीहे चोंच खोल, अमृत पाने को लपके है... धरती अंबर के पुनर्मिलन का शुभ संदेशा लाए हैं...तुम...
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दिलीप
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[30 May 2010 11:17 AM]



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