कबाड़ी वाला
कोलतार-सी धधकती देह पर ठुकी-झाँकती दो पनियल आँखें सूखते होंठ-कर्रे बाल लिये अधखुले धूल से सने पपोटे ताकता है वह कभी आकाश तो कभी घास के विराट मैदान-सा रीता ठेला और लगाता है ज़ोर-की आवाज़ ”पेप्परला-कोप्पीला-ताबला-पेचपुर्ज़ा-खाली बोत्तल-कबाड़ला..” और हाँफ...
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Amitraghat
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[30 May 2010 10:35 AM]



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