मेरे हाथों एक कबूतर कि जान बची , और "कविता सी" बन गयी
(खैर…! मैंने, कबूतर को उठाया; तो वह "थोड़ा फड़फड़ाया", उसके फड़फड़ाने से, “ये बच जायेगा” ; मैंने, "कुछ अंदाज" लगाया )। वैसे तो बचपन से घायल पक्षियों को बचाने के बहुत से अवसर मिले एक दो बार तो दिल्ली में लालकिले के सामनेजैनमंदिर (पक्षियों का अस्पताल) भी उन्हें...
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शंकर फुलारा
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[30 May 2010 06:41 AM]



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